उत्तर प्रदेश से जुड़े एक विवादित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल आशंकाओं के आधार पर किसी फिल्म पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
याचिका का दावा
- याचिका विश्व यादव परिषद के प्रमुख की ओर से दाखिल की गई थी।
- आरोप था कि फिल्म का शीर्षक यादव समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक स्टीरियोटाइप बनाता है।
- साथ ही यह भी कहा गया कि फिल्म में एक हिंदू लड़की और मुस्लिम युवक के बीच प्रेम संबंध दिखाया गया है, जिससे सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को नुकसान हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
- जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने सुनवाई की।
- अदालत ने सवाल किया— “क्या हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के से विवाह करना राष्ट्रीय ताने-बाने को नष्ट करता है?”
- कोर्ट ने कहा कि फिल्म का शीर्षक मात्र किसी समुदाय को बदनाम नहीं कर सकता।
‘घूसखोर पंडित’ से अलग मामला
- अदालत ने हाल ही में आए ‘घूसखोर पंडित’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि वहां शीर्षक में नकारात्मकता थी।
- लेकिन ‘यादव जी की लव स्टोरी’ में ऐसा कोई नकारात्मक शब्द या भाव नहीं है।
‘मोटी चमड़ी रखें’
- याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि रिलीज के बाद भावनाएं आहत हो सकती हैं।
- इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हल्के अंदाज में कहा— “मोटी चमड़ी रखें। यह एक काल्पनिक कहानी है। एक हफ्ते में सब खत्म हो जाएगा। आजकल वैसे भी सब मोबाइल पर ही देखा जा रहा है।”
अंतिम आदेश
- अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
- कोर्ट ने कहा कि सामाजिक विविधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संदेह की नजर से देखना संविधान की भावना के खिलाफ है।
👉 यह फैसला न सिर्फ फिल्म निर्माताओं के लिए राहत है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट स्थिति भी दर्शाता है।